पवनसुत पदावली — Pavansut Padavali
A Hanuman stuti in the shape of a Chalisa — two opening dohas, thirty chaupais, and a closing doha. First printed as a booklet in 2025.
The complete text follows, in the booklet's order.
मंगलाचरण
॥ दोहा १ ॥
जय बजरंगी महाबली ।
अंजनीसुत नररूप ॥
जहाँ राम वहाँ तुम सदा ।
कृपा करें अनूप ॥॥
॥ दोहा २ ॥
मन मंदिर में ज्योति जले ।
प्रेम से मन बहलाए ॥
राम नाम से विश्व चले ।
हर दुख कष्ट बहाए ॥॥
आवाहन
॥ १ ॥
जय हनुमान संत हितकारी ।
हमें सुन लीजिए प्रभु उपकारी ॥
अंजनी पुत्र संकट हरता ।
तुमसे प्रेम कौन न करता ॥॥
॥ २ ॥
निष्ठावान गुणी रुद्र अवतारा ।
शरणागतों के दुख निवारा ॥
अंजनेय अत्यंत बलवान ।
हमें स्वीकारें श्री हनुमान ॥॥
॥ ३ ॥
तुमसे बड़ा भक्त नहीं है ।
अतिवीर केसरीनंदन की जय ॥
तुम ही राम वचन के पालक ।
पवन तनय सबके उद्धारक ॥॥
॥ ४ ॥
जय जय जय श्री धन्वंतरी ।
आप हटाते हर अंधियारी ॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता ।
जग में तुम सम नहीं कोई भ्राता ॥॥
महिमा
॥ ५ ॥
संकटमोचन है नाम तुम्हारा ।
आपके सिवा न कोई सहारा ॥
शक्ति भक्ति और सिद्धि के दाता ।
आपकी पुकार पर कौन न आता ॥॥
॥ ६ ॥
नाम आपका है संकटमोचक ।
पीड़ा पर भी रहें प्रतिबोधक ॥
सिया राम के तुम रखवारे ।
सब निर्बलों के तुम ही सहारे ॥॥
॥ ७ ॥
तुम राम के शाश्वत साथी ।
संकट बीच तुम्हारी याद आती ॥
कर्म योग और राम के ज्ञाता ।
आपका भक्त प्रभु को पाता ॥॥
॥ ८ ॥
जय गुरुदेव ज्ञान के सागर ।
सदा रहें वह सूक्ष्म व जागर ॥
महावीर अतिसक्षम प्रतिहारी ।
बुद्धिहीन पर कृपा तुम्हारी ॥॥
॥ ९ ॥
तुम्हारे चरणों में त्रिभुवन ।
तुम्हीं से गतिमान है पवन ॥
तुम्हारे गुण हर युग है गाता ।
विजयी रहो हे भीम के भ्राता ॥॥
॥ १० ॥
सम्मान व आदर तुम्हारी निशानी ।
आपकी कथाएँ किसने न जानी ॥
गरिमा को आपने बचाया ।
लंका को अग्नि से मिलवाया ॥॥
लीला
॥ ११ ॥
आप-सी विनम्रता जग ने न देखी ।
संतों की वाणी भी लेखी ॥
लक्ष्मण पर जब संकट छाया ।
संजीवनी ला जीवन लौटाया ॥॥
॥ १२ ॥
आपके वचन कष्ट मिटाएँ ।
अग्नि जैसे पवित्र कर पाएँ ॥
हृदय चीर कर जग को दिखाया ।
राम-सिया को उसमें पाया ॥॥
फलश्रुति
॥ १३ ॥
राम नाम जपे जो भी ।
वही आपके ज्ञान का लोभी ॥
भक्त जो भजन आपके गाए ।
राम नाम के दर्शन पाए ॥॥
॥ १४ ॥
जय हनुमान, निश्चय के दाता ।
जो कोई भी आपके गुण गाता ॥
सुख शांति उसके घर आती ।
जिसके मन में माँ सिया समाती ॥॥
॥ १५ ॥
जो भी प्रेम के फूल चढ़ाता ।
आपका हृदय उसको अपनाता ॥
हनुमान जाप करे जो भी ।
सदा रहें रघुप्रेम का भोगी ॥॥
॥ १६ ॥
तुम्हारे लिए भजन जो गाते ।
नम्र हृदय वही अपनाते ॥
प्राण हृदय पर जब संकट आए ।
पीड़ा से हनुमान छुड़ाए ॥॥
हमारी दशा
॥ १७ ॥
हमें विश्व का ज्ञान नहीं है ।
मन में हमारे द्वेष ही है ॥
एकजुट होकर भी हैं बिखरे ।
हमारे नीलकंठ ही निकले ॥॥
॥ १८ ॥
हमें है सहस्र वर्ष की पीड़ा ।
हमें दिखाएँ हनुमत बलवीरा ॥
मानव प्रतीक्षा में नयन बिछाए ।
आपकी आशा में दीप जलाए ॥॥
॥ १९ ॥
जिनके दिल अभिमान से भारी ।
उनके दिल कभी न सुखकारी ॥
जाएँ रोग हटे सब पीड़ा ।
जीव से निकले बस नीरा ॥॥
॥ २० ॥
हृदय में शत्रुओं को कैसे पहचानूँ ।
इस रहस्य को प्रभु मैं न जानूँ ॥
दिल से घृणा कैसे हटाई ।
मन में एकता कैसे लाई ॥॥
प्रार्थना
॥ २१ ॥
रक्षा करो विघ्न मिटाओ ।
असली शत्रु का परिचय बताओ ॥
महाप्रभु हमारे दिल से देखें ।
आपके प्रेम से हम भी सीखें ॥॥
॥ २२ ॥
शुद्ध विचार मिलें मनभावन ।
मन व हृदय करें अतिपावन ॥
जय गिरिधर, जय बली बलस्वामी ।
प्रयत्न करें हटाएँ हर ग्लानि ॥॥
॥ २३ ॥
जय महाप्रभु सिद्धि कीजै ।
शक्ति अपने भक्तों को दीजै ॥
हमें दें आप अपने दर्शन ।
हमारे फल आपको अर्पण ॥॥
॥ २४ ॥
जीवन में दें प्रभु हमें श्रद्धा ।
सुख समृद्ध रहे हर वृद्धा ॥
हर चेहरे पर रहे उजियारी ।
रहे ये भूमि युवा को प्यारी ॥॥
॥ २५ ॥
प्रजा भक्तों के तुम रखवारे ।
संकट हरण तुम करो हमारे ॥
जय महावीर हमें सुनाएँ ।
श्रीराम के गुणों को गाएँ ॥॥
॥ २६ ॥
प्रेम समर्पण आपसे सीखें ।
आपके हृदय में रघुपति को देखें ॥
हमारी अंधेरी नगरी में आएँ ।
ज्ञानी प्रकाश से कष्ट मिटाएँ ॥॥
॥ २७ ॥
हम सब की आपमें श्रद्धा ।
हमको दीजिए आपकी विद्या ॥
राम नाम तुमको अति प्यारा ।
सदा जपो तुम मंत्र ये न्यारा ॥॥
॥ २८ ॥
सत्य वचन शुद्धि ही राम हैं ।
अंतरमन का यही धाम है ॥
जिस पथ पर चरण हो तुम्हारा ।
वही बन जाए जीवन हमारा ॥॥
समर्पण
॥ २९ ॥
भक्तिपथ के तुम पथगामी ।
कर दो मन मंदिर अभिरामी ॥
चरणों की रज बन जाए श्वास ।
हृदय बने तुम्हारा निवास ॥॥
॥ ३० ॥
हमारी प्रार्थना गुरुदेव करें स्वीकार ।
आपकी कृपा से जीवन अपार ॥
चरणों में रखे हैं सुमन मनभानी ।
क्षमा करो प्रभु, हर अनजानी ॥॥
समापन
॥ दोहा ३ ॥
शरण तुम्हारी मिल जाए ।
संकट मिटे संहार ॥
मन मंदिर में बसे रहो ।
रघुवीर भक्त उजियार ॥॥
About this edition
This is the 2025 booklet reset: the same words, arranged into the movements above, with the spelling settled and the type set again from nothing. The colophon still reads प्रथम संस्करण, २०२५ deliberately — this is the first edition corrected, not a second one. The text was closed on 31 August 2026; the design remains open.
The emendations are spelling only — अनुप → अनूप, धनवन्तारी → धन्वंतरी, हटायें → हटाएँ, जोभी → जो भी, अंजनीय → अंजनेय — and no line's ending sound was altered anywhere. One word was chosen rather than corrected: सिद्धारक → उद्धारक.
The booklet is written in tatsam Hindi, and its line runs to seventeen matras rather than the sixteen of chaupai.
The leaf is A6 landscape, 148 × 105 mm, four to an A4 sheet, and keeps the original's furniture — ornamental border, gold rules, lotus corners, Devanagari folios, and a faint mandala behind the verses. The pointing is supplied by the macros rather than typed, so it stays uniform across all thirty-three quatrains: odd lines close on ।, even lines on ॥, and a stanza signs off with the doubled ॥॥ of the original.
रचना एवं संकलन — नव्य शर्मा · प्रथम संस्करण, २०२५